कभी जिसकी मिठास दुनिया के हर कोने में पहचान बनाती थी, आज वही केसर आम अपनी पहचान बचाने की जंग लड़ रहा है। गुजरात के गिर क्षेत्र का यह खास आम सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि वहां के किसानों की मेहनत, परंपरा और गर्व का प्रतीक रहा है। लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। प्रकृति का मिजाज पहले जैसा नहीं रहा। मौसम का संतुलन बिगड़ चुका है। कभी समय पर बारिश होती थी, तापमान अनुकूल रहता था और पेड़ों पर लदे आम किसानों की मेहनत का फल बनकर सामने आते थे। लेकिन अब बेमौसम बारिश, तेज गर्मी और जलवायु परिवर्तन ने इस पूरी व्यवस्था को हिला कर रख दिया है। आज स्थिति ऐसी हो गई है कि कई किसान मजबूरी में अपने सालों पुराने आम के बाग काट रहे हैं।
जब मौसम बना सबसे बड़ा दुश्मन
खेती हमेशा से प्रकृति पर निर्भर रही है, लेकिन अब प्रकृति का स्वभाव अनिश्चित हो गया है। केसर आम की खेती में सबसे अहम समय होता है फूल आने और फल बनने का। यही वह दौर होता है जब थोड़ी सी भी गड़बड़ी पूरी फसल को प्रभावित कर सकती है। लेकिन अचानक बारिश या तेज गर्मी के कारण फूल झड़ जाते हैं या फल बनने से पहले ही खराब हो जाते हैं। कभी दाने काले पड़ जाते हैं, तो कभी उनमें सफेदी आ जाती है। किसानों के लिए यह सबसे बड़ा झटका है, क्योंकि वे पूरी उम्मीद के साथ फसल तैयार करते हैं, लेकिन अंत में उन्हें निराशा ही हाथ लगती है।
एक किसान की कहानी, हजारों की सच्चाई
गुजरात के गिर क्षेत्र के एक छोटे से गांव खीरीधार के किसान प्रवीण भाई की कहानी आज हजारों किसानों की सच्चाई बन चुकी है। उन्होंने अपने परिवार के साथ मिलकर 9 बीघा जमीन में केसर आम का बाग लगाया था। एक समय था जब यह बाग उनकी खुशहाली का आधार था। हर साल लाखों रुपये की कमाई होती थी, घर में खुशहाली रहती थी और भविष्य सुरक्षित नजर आता था। लेकिन पिछले तीन सालों में सब कुछ बदल गया। अब वही बाग घाटे का सौदा बन गया है। हर साल करीब 80 हजार रुपये कीटनाशक, खाद और मजदूरी पर खर्च करने के बावजूद उन्हें उतनी पैदावार नहीं मिलती, जितनी लागत निकल सके। जब मेहनत का फल नहीं मिलता, तो उम्मीद भी धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। यही कारण है कि प्रवीण भाई जैसे कई किसान अब खेती बदलने का फैसला कर रहे हैं।
परंपरा से समझौता: जब बाग काटने पड़े
किसान के लिए अपने बाग को काटना कोई आसान निर्णय नहीं होता। यह सिर्फ पेड़ों को हटाना नहीं, बल्कि सालों की मेहनत, यादों और उम्मीदों को खत्म करना होता है। लेकिन जब लगातार नुकसान हो और भविष्य में भी सुधार की उम्मीद न दिखे, तो किसान मजबूर हो जाता है। यही वजह है कि अब कई किसान केसर आम के बाग हटाकर दूसरी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं। वे ऐसी फसलें चुन रहे हैं जो जल्दी तैयार हो जाएं, जिनमें जोखिम कम हो और जिनसे कम से कम लागत निकल सके। मूंगफली, उड़द, चना, गेहूं और बाजरा जैसी फसलें अब उनकी नई उम्मीद बन रही हैं।
जलवायु परिवर्तन का गहरा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक क्षेत्र की समस्या नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर हो रहे जलवायु परिवर्तन का असर है। तापमान में बढ़ोतरी, बारिश के पैटर्न में बदलाव और मौसम की अनिश्चितता ने खेती को जोखिम भरा बना दिया है। बागवानी विभाग के अनुसार, अब कुछ किसान अपने बाग हटा रहे हैं। हालांकि, यह संख्या अभी कम है, लेकिन अगर हालात ऐसे ही रहे तो यह बढ़ सकती है। दिलचस्प बात यह है कि जो किसान प्राकृतिक या जैविक खेती की ओर बढ़ रहे हैं, उन्हें अपेक्षाकृत बेहतर परिणाम मिल रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि खेती के तरीकों में बदलाव भी जरूरी हो गया है।
घटता उत्पादन, बढ़ती चिंता
अगर आंकड़ों की बात करें, तो केसर आम के उत्पादन में भी उतार-चढ़ाव साफ दिखाई दे रहा है। कुछ साल पहले जहां बाजार में बड़ी मात्रा में आम आता था, वहीं अब इसकी आवक कम हो गई है। कभी बाजार में लाखों बॉक्स आम आते थे, लेकिन अब यह संख्या घटती जा रही है। आम की आवक में पिछले कुछ वर्षों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। तलाला के मैंगो मार्केट का उदाहरण लें तो साल 2019 में यहां करीब 7.75 लाख बॉक्स आम पहुंचे थे, लेकिन 2022 तक यह संख्या घटकर लगभग 5 लाख बॉक्स रह गई। इसके बाद 2023 में थोड़ी सुधार की स्थिति बनी, लेकिन 2024 में फिर से गिरावट दर्ज की गई। बागवानी विभाग के अनुसार, गिर सोमनाथ जिले में लगभग 19,000 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में आम की खेती होती है। यह इलाका आम उत्पादन के लिए जाना जाता है, लेकिन बदलते हालातों के कारण यहां की पैदावार और बाजार में आने वाली मात्रा पर असर साफ दिखाई दे रहा है। यह गिरावट सिर्फ उत्पादन में कमी नहीं दिखाती, बल्कि यह उस संकट की ओर इशारा करती है, जो धीरे-धीरे गहराता जा रहा है।
