भारत की खुशबूदार पहचान कहे जाने वाले बासमती चावल का व्यापार इन दिनों चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग होने के बावजूद निर्यातकों के सामने ऐसी बाधाएं खड़ी हो रही हैं, जो उनके मुनाफे और कारोबार की गति दोनों को प्रभावित कर रही हैं। पंजाब के निर्यातकों ने अब खुलकर अपनी चिंता जताई है और सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग की है।
इस पूरे मुद्दे का केंद्र बना है Basmati Export Development Foundation, जिसकी कार्यप्रणाली और बढ़ी हुई फीस को लेकर निर्यातकों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। उनका मानना है कि अगर समय रहते सुधार नहीं किए गए, तो भारत का बासमती व्यापार अपनी रफ्तार खो सकता है।
क्या है असली समस्या? क्यों बढ़ रही है निर्यातकों की चिंता?
बासमती चावल का कारोबार सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि लाखों किसानों और हजारों उद्योगों की आजीविका से जुड़ा हुआ है। ऐसे में जब इस सेक्टर में कोई असंतुलन आता है, तो उसका असर व्यापक स्तर पर देखने को मिलता है। निर्यातकों का कहना है कि पिछले कुछ समय से लागत बढ़ रही है, जबकि मुनाफा लगातार घट रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं—वैश्विक परिस्थितियां, बाजार में प्रतिस्पर्धा और सबसे अहम, संस्थागत स्तर पर बढ़ता दबाव।
फीस में भारी बढ़ोतरी: क्या व्यापारियों पर पड़ा दोहरा बोझ?
सबसे बड़ा मुद्दा बना है कॉन्ट्रैक्ट रजिस्ट्रेशन फीस में हुई अचानक बढ़ोतरी। पहले जहां यह शुल्क ₹30 प्रति टन था, वहीं अब इसे बढ़ाकर ₹70 प्रति टन कर दिया गया है। यह बदलाव केवल आंकड़ों में छोटा लग सकता है, लेकिन बड़े पैमाने पर व्यापार करने वाले निर्यातकों के लिए यह लाखों रुपये का अतिरिक्त खर्च बन जाता है। ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार पहले ही अस्थिर है, यह बढ़ोतरी व्यापारियों के लिए एक और झटका साबित हो रही है।
वैश्विक परिस्थितियों का असर
बासमती चावल का बड़ा बाजार पश्चिम एशिया में है। लेकिन वहां के राजनीतिक और आर्थिक तनाव का सीधा असर भारतीय निर्यात पर पड़ रहा है। जब बाजार अनिश्चित होता है, तो कीमतें गिरती हैं और मांग में उतार-चढ़ाव आता है। ऐसे में अगर घरेलू स्तर पर भी लागत बढ़ जाए, तो निर्यातकों के लिए स्थिति और कठिन हो जाती है।
BEDF की भूमिका पर सवाल: क्या संस्था अपने उद्देश्य से भटक गई है?
करीब 23 साल पहले बनाई गई Basmati Export Development Foundation का उद्देश्य था बासमती चावल की गुणवत्ता को बेहतर बनाना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी ब्रांडिंग को मजबूत करना। लेकिन अब निर्यातकों का कहना है कि संस्था अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है। कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी और निर्णय लेने में देरी जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं।
विशेषज्ञों की कमी बन रही बड़ी बाधा
निर्यातकों का मानना है कि संस्था में अनुभवी और विशेषज्ञ लोगों की कमी है। बासमती कारोबार केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रोसेसिंग, क्वालिटी कंट्रोल, मार्केटिंग और एक्सपोर्ट मैनेजमेंट जैसे कई पहलू शामिल हैं। अगर इन सभी क्षेत्रों की समझ रखने वाले विशेषज्ञ संस्था में नहीं होंगे, तो सही निर्णय लेना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि अब विशेषज्ञों की नियुक्ति पर जोर दिया जा रहा है।
लंबी अवधि की योजना क्यों जरूरी है?
बासमती चावल का बाजार तेजी से बदल रहा है। प्रतिस्पर्धी देश भी इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं। ऐसे में भारत को अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए एक स्पष्ट और मजबूत रणनीति की जरूरत है। निर्यातकों का कहना है कि बिना दीर्घकालिक योजना के यह संभव नहीं है। उन्हें उम्मीद है कि सरकार इस दिशा में जल्द कदम उठाएगी।
हाई पावर टास्क कमेटी की मांग
पंजाब के निर्यातकों ने सरकार से एक “हाई पावर टास्क कमेटी” बनाने की मांग की है। इस कमेटी में किसानों, निर्यातकों, प्रोसेसिंग यूनिट्स और विशेषज्ञों को शामिल किया जाए। इसका उद्देश्य होगा सभी पक्षों की समस्याओं को समझना और एक ऐसा समाधान निकालना, जो पूरे सेक्टर के लिए लाभकारी हो।
संस्था में सुधार की जरूरत
निर्यातकों ने यह भी सुझाव दिया है कि संस्था के संचालन में सुधार किया जाए। खासकर नेतृत्व स्तर पर बदलाव जरूरी है। उन्होंने यह प्रस्ताव भी रखा है कि डायरेक्टर की अधिकतम उम्र 60 साल तय की जाए, ताकि वे लंबे समय तक स्थिरता के साथ काम कर सकें और योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू कर सकें।
भारत के बासमती निर्यात आंकड़े
भारत दुनिया में बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक देश है। साल 2025-26 में अप्रैल से फरवरी के बीच भारत ने लगभग 6.07 मिलियन टन बासमती चावल का निर्यात किया। इस निर्यात की कुल कीमत करीब 5.27 अरब डॉलर यानी लगभग 46,403 करोड़ रुपये रही। यह आंकड़े दिखाते हैं कि यह सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था में कितना महत्वपूर्ण योगदान देता है।
निर्यातकों का मानना है कि अगर समय रहते सुधार किए जाएं, तो यह सेक्टर फिर से तेजी पकड़ सकता है। बेहतर नीतियां, पारदर्शी कार्यप्रणाली और विशेषज्ञों की भागीदारी से न केवल निर्यात बढ़ेगा, बल्कि किसानों को भी बेहतर कीमत मिलेगी।
चुनौतियों के बीच उम्मीद की किरणबासमती चावल का व्यापार फिलहाल चुनौतियों से घिरा हुआ है, लेकिन इसमें संभावनाओं की कोई कमी नहीं है। अगर सरकार और संबंधित संस्थाएं समय पर सही निर्णय लेती हैं, तो यह सेक्टर न केवल अपनी पुरानी रफ्तार हासिल कर सकता है, बल्कि नई ऊंचाइयों तक भी पहुंच सकता है। यह केवल व्यापार का मामला नहीं है, बल्कि लाखों किसानों और देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ विषय है।
